आखिर वसुंधरा राजे का शक्ति प्रदर्शन क्यों बदला भक्ति प्रदर्शन में, सामने आई वजह

आखिर वसुंधरा राजे का शक्ति प्रदर्शन क्यों बदला भक्ति प्रदर्शन में, सामने आई वजह
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  • वसुंधरा राजे का शक्ति प्रदर्शन बदला भक्ति प्रदर्शन में, सामने आई ये वजह

  • वसुंधरा राजे ने अपनी देव दर्शन यात्रा पर कहा कि शक्ति प्रदर्शन नहीं भक्ति प्रदर्शन है

जयपुर.

ढाई साल की खामोशी के बाद वसुंधरा राजे ने देव दर्शन यात्रा से फिर हुंकार भरी है. वसुंधरा राजे की इस यात्रा की तैयारी ठीक वैसी ही है, जैसी मध्य प्रदेश में दिग्विजय की नर्मदा यात्रा की थी. नर्मदा यात्रा ही थी कि मध्य प्रदेश की राजनीति मे किनारे जा चुके दिग्गी राजा 2018 के विधानासभा चुनाव में सीएम की कुर्सी के फिर दावेदार बन कर खड़े हो गए थे.

राजे की यात्रा का शंखनाद वैसा नहीं रहा जैसी उम्मीद और अटकलें थी. प्रतिफल का इंतजार है. बीजेपी संगठन से जुड़े कई नामवार नेता आंशकित थे कि मौजूदा विधायकों की एक बड़ी तादाद राजे की यात्रा में न पहुचं जाए. ऐसा हुआ नहीं. राजे की यात्रा में विधायक तो पहुंचे. सिर्फ वही जिन पर राजे के नजदीकी होने का ठप्पा पहले से है. हां, आठ बीजेपी सासंद जरूर पहुंचे जिनमें एक खुद राजे के पुत्र दुश्यंत सिंह भी है.

राजे गुट ने भरतपुर जिले को इस धार्मिक यात्रा के शक्ति प्रदर्शन के लिए इसलिए चुना कि पंचायत से लेकर नगरीय निकाय के चुनाव में भरतपुर और नजदीक के धौलपुर करौली में बीजेपी खास प्रदर्शन नहीं कर पाई थी. राजे गुट को उम्मीद थी कि मौजूदा नेतृत्व से खफा पार्टी के कार्यकर्ता- नेताओं की भारी भीड़ उमड़ेगी, भीड़ आई जरूर लेकिन उतनी नहीं जिसका अनुमान और तैयारी थी.

भगवान श्री कृष्ण की भूमि ब्रज चौरासी के परिक्रमा पथ को धार्मिक यात्रा के शक्ति प्रदर्शन के लिए इसलिए चुना कि इस पथ का विकास राजे के कार्यकाल में ही हुआ था. करीब 300 करोड़ खर्च किए थे. 82 किलोमीटर के इस पथ में 27 गांव आते हैं. कई मंदिर है. इसलिए इस परिक्रमा पथ पर देव दर्शन यात्रा की तैयारी का जिम्मा भी तत्कालीन सार्वजनिक निर्माण मंत्री यूनूस खान को सैौंपा था. यूनूस खान ने कई दौरे भी कई परिक्रमा पथ और पथ के गांवो के नेताओं की भीड़ में भी कोटा डिविजन के नेता अधिक थे.

प्रताप सिंह सिंघवी, प्रहलाद गुंजल और भवानी सिंह राजावात जैसे नेताओं ने हाड़ौती से भीड़ लाने की जिम्मेदारी उठाई. कोटा में ही एक महीने पहले राजे समर्थकों ने एक चिंतन शिविर आयोजित कर राजे को सीएम प्रोजेक्ट करने की मांग की थी. यात्रा अचानक नहीं हुई. एक महीने की तैयारी थी. खुद वसुंधरा राजे ने मोर्चा संभाला था. फोन करके बुलावा भेजा था. नजीदीकी नेताओं ने विधायकों, सासंदों, पार्टी के असंतुष्ट नेताओ को लाने का मोर्चा संभाला था.

विरोधियों को दिया साफ संदेश

2018 के विधासनभा चुनाव में टिकट वसुंधरा राजे ने ही बांटे थे. जाहिर है चुने गए विधायकों में बड़ी तादाद राजे समर्थकों की मानी जाती रही. बावजूद अधिकतर चुने हुए विधायकों ने राजे के इस राजनीतिक दर्शन से खुद को दूर रखा. राजे समर्थक नेता भवानी सिंह राजावात ने पार्टी नेतृत्व से राजे को 2023 के लिए सीएम प्रोजेक्ट करने की मांग कर यात्रा का मकसद भी जाहिर कर दिया. राजे को फिर सफाई देनी पड़ी. यात्रा शक्ति प्रदर्शन नहीं भक्ति प्रदर्शन है. राजनीति नहीं धर्मनीति है लेकिन राजे ने यात्रा का लक्ष्य पहले दिन ही साफ कर दिया था जब कहा था कि जिस कमल को उनकी मां विजयराजे सिंधिया ने खिलाया था, उसे वे मुरझाने नहीं देगी. विरोधियोंं को संदेश साफ है कि वे न नई पार्टी बनाएगी न, खामोश रहेगी. दम ठोकेंगी.

बीजेपी नेतृत्व पर दबाव बनाने की रणनीति

राजे ने गहलोत सरकार को उखाड़ फेंकने की बात करते ये भी जता दिया कि भले ही वे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, लेकिन राजस्थान में मोर्चा वही संभालेगी. अब सवाल ये कि 2023 के चुनाव में काफी वक्त है, राजे जल्दबाजी क्यों दिखा रही है ताकत दिखाने के लिए. उसके पीछे वजह है पिछले ढ़ाई साल में राजस्थान बीजेपी के रणनीतिक और संगठनात्मक फैसलों में राजे किनारे ही रही. ये ही हालत के उनके गुट के नेताओं की रही. पंचायत चुनाव में राजे के बगैर राजस्थान में बीजेपी ने जीत हासिल की थी. इससे राजे गुट बैचेन था कि कहीं 2023 तक किनारे न हो जाए. राजस्थान में चार विधानसभा के उपचुनाव हैं. इन उपचुनावों से पहले राजे ताकत दिखाकर जताना चाहती कि उनके बिना कांग्रेस को हराना मुमकिन नहीं. राजे गुट को लग रहा है कि अगर अभी देर की तो कहीं 2023 में सीएम की रेस से ही दूर न हो जाए. देव दर्शन यात्रा की इस ताकत को देखकर फिलहाल लग नहीं रहा है कि राजे बीजेपी नेतृत्व पर कोई खास दबाब बना पाएगी.



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